जब तक बच्चा रोता नहीं माँ भी दूध नहीं पिलाती ..क्या करें मिडिल क्लास मध्यमवर्ग कहाँ रोये

जब तक बच्चा रोता नहीं माँ  भी दूध नहीं पिलाती ..क्या करें  मिडिल क्लास मध्यमवर्ग  कहाँ रोये

t4unews:उठने लगी आवाज अब  सोशल मीडिया में भी मिडिल क्लास मध्यमवर्ग की भी ..सरकार द्वारा अपनी, कमाई के सब साधन खोल दिया है केवल ऊपर और नीचे वालों के लिऐ :-
1. दारू चालू,
2. गुटका चालू,
3. पेट्रोल पंप चालू (पूरी रेट पर)
4. RBI and  bank  ब्याज चालू,
5.ऑनलाइन मार्केट चालू,
6. डीडी नेशनल चालू,
7. सभी विभाग के टैक्स चालू (भूमि कर, लाइसेंस फीस)
8. लाईट बिल चालू,

गरीब के लिए सब फ्री जो कभी टैक्स नहीं देता
1. कारोना टेस्ट फ्री
2. राशन फ्री
3. दाल फ्री
4. मनरेगा चालू (नई दर के साथ)
5. गैस फ्री
6. बिना काम के मजदूरी चालू

माध्यम वर्ग सभी जगह दबता चल ...क्यों की तू पैदा ही ऐसे देश में हुआ है
1. सरकार को बिल का भुगतान कर
2. बच्चो की स्कूल फीस भर
3. सभी लाइसेंस फीस भर
4. दुकान, उद्योग पर कर्मचारी को बिना काम तंखा दे.
5. बिना दुकान खोले, किराया, लाईट बिल दे.
6. बैंक को पूरा ब्याज दे नहीं दिया तो अतिरिक्त भार झेल.
7. सरकार को दान दे.
8. आसपास के जरूरत मन्द को भोजन समान दे.
9. तेरी बचत पर ब्याज कम कर दिया है.
10. धंधा करना है तो सरकार के नियम की पालन  कर.
,................................... 40 दिन सरकार के पास टैक्स नही आया तो सरकार वेतन नही दे पा रही और मिडिल क्लास मध्यमवर्ग के पास पेड़ लगा हुआ है जो टैक्स भी दे,किराया भी दे,सैलरी भी दे, स्कूल की फीस भी दे और अपने घर परिवार की भी पाले।

ऐसा लग रहा है कि  देश में सिर्फ मजदूर ही रहते हैं....

बाकी क्या भटे बघार रहे हैं?

अब मजदूरों के साथ मिडिल क्लास मध्यमवर्ग का
का रोना- धोना  कोई सुने तो मरहम लगे त्रासदी में  !
मजदूर घर पहुंच गया तो ..उसके परिवार के पास मनरेगा का जाब कार्ड , राशन कार्ड होगा ! सरकार मुफ्त में चावल व आटा दे रही है । जनधन खाते होंगे तो मुफ्त में  2000 रु.  भी मिल गए होंगे,और आगे भी मिलते रहेंगे।
बहुत  हो गया मजदूर- मजदूर
अब जरा  मिडिल क्लास मध्यमवर्ग के बारे में भी सोचिये..

जिसने लाखों रुपये का कर्ज लेकर प्राइवेट कालेज से इंजीनियरिंग  किया था ..और अभी कम्पनी में 5 से 8 हजार की नौकरी पाया था ( मजदूरों को मिलने वाली मजदूरी से भी कम ), लेकिन मजबूरीवश अमीरों की तरह रहता था ।
( बचत शून्य है )

जिसने अभी अभी नयी नयी वकालत शुरू की थी ..दो -चार साल तक वैसे भी कोई केस नहीं मिलता ! दो -चार साल के बाद ..चार पाच हजार रुपये महीना मिलना शुरू होता है , लेकिन मजबूरीवश वो भी अपनी गरीबी का प्रदर्शन नहीं कर पाता,और चार छ: साल के बाद.. जब थोड़ा कमाई बढ़ती है, दस पंद्रह हजार होती हैं तो भी..लोन वोन लेकर ..कार वार खरीदने की मजबूरी आ जाती है । ( बड़ा आदमी दिखने की मजबूरी जो होती है। ) अब कार की किस्त भी तो भरना है ?

- उसके बारे में भी सोचिये..जो सेल्स मैन , एरिया मैनेजर का तमगा लिये घूमता था। बंदे को भले ही आठ  हज़ार   रुपए महीना मिले, लेकिन कभी अपनी गरीबी का प्रदर्शन नहीं किया ।

उनके बारे में भी सोचिये जो बीमा ऐजेंट , सेल्स एजेंट बना मुस्कुराते हुए घूमते थे। आप कार की एजेंसी पहुंचे नहीं कि कार के लोन दिलाने से ले कर कार की डिलीवरी दिलाने तक के लिये मुस्कुराते हुए , साफ सुथरे कपड़े में , आपके सामने हाजिर ।
बदले में कोई कुछ हजार रुपये ! लेकिन अपनी गरीबी का रोना नहीं रोता है।आत्म सम्मान के साथ रहता है।
मैंने संघर्ष करते वकील , इंजीनियर , पत्रकार , ऐजेंट,सेल्समेन,छोटे- मंझोले दुकान वाले, क्लर्क, बाबू, स्कूली  माटसाब, धोबी, सलून वाले, आदि देखे हैं ..अंदर भले ही चड़ढी- बनियान फटी हो,मगर  अपनी गरीबी का प्रदर्शन नहीं करते हैं ।
और इनके पास न तो मुफ्त में चावल पाने वाला राशन कार्ड है , न ही जनधन का खाता , यहाँ तक कि गैस की सब्सिडी भी छोड़ चुके हैं ! ऊपर से मोटर साइकिल की किस्त , या कार की किस्त ब्याज सहित देना है ।
बेटी- बेटा की एक माह की फीस बिना स्कूल भेजे ही इतनी देना है, जितने में दो लोगों का परिवार आराम से एक महीने खा सकता है ,
परंतु गरीबी का प्रदर्शन न करने की उसकी आदत ने उसे सरकारी स्कूल से लेकर सरकारी अस्पताल तक से दूर कर दिया है।

ऐसे ही टाईपिस्ट , स्टेनो , रिसेप्सनिस्ट ,ऑफिस बॉय जैसे लोगो का वर्ग है।
अब ऐसा वर्ग क्या करे वो तो...फेसबुक पर बैठ कर अपना दर्द भी नहीं लिख सकता है  (  बड़ा आदमी दिखने की मजबूरी जो है। )

तो मजदूर की त्रासदी का विषय मुकाम पा गया है..

मजदूरो की पीडा  का नाम देकर मिडिल क्लास मध्यमवर्ग अपनी पीडा व्यक्त करने  से गुरेज कर रहा है ?

( क्या पता है हकीकत आपको ? IAS , PSC का सपना लेकर रात- रात भर जाग कर पढ़ने वाला छात्र तो बहुत पहले ही  दिल्ली व इंदौर से पैदल निकल लिये थे ....अपनी पहचान छिपाते हुये ..मजदूरों के वेश में ?
क्यूं वो अपनी गरीबी व मजबूरी की दुकान नहीं सजा पाया ?  क्योँ की वह  मिडिल क्लास मध्यमवर्ग से है और आँसू  आखों  के अंदर पी  कर जीता रहता है ।
काश! कोई राहत देश के  मध्यम वर्ग  के लिऐ भी होता?